उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sharminda hum junun se hain ek ek tar ke

शर्मिंदा हम जुनूँ से हैं एक एक तार के

شرمندہ ہم جنوں سے ہیں ایک ایک تار کے

शायर: Tabish Dehlvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस शीर्षक की यह संग्रह प्रविष्टि 2 है। समान शीर्षक के रिकॉर्ड में पाठ या श्रेय का अंतर है; इसे स्वतंत्र आधिकारिक संस्करण का दावा न मानें। अन्य संग्रह प्रविष्टि 1

शर्मिंदा हम जुनूँ से हैं एक एक तार के
क्या कीजिए कि दिन हैं अभी तक बहार के

ऐ उम्र-ए-शौक़ देखिए मिलता है क्या जवाब
हम ने किसी का नाम लिया है पुकार के

सर-गश्ता-ए-अलम हो कि शोरीदा-सर कोई
एहसाँ हैं अहल-ए-शौक़ पे दीवार-ए-यार के

अल्लाह रे इंतिज़ार-ए-बहाराँ की लज़्ज़तें
गुज़री है यूँ ख़िज़ाँ भी कि दिन हों बहार के

'ताबिश' सुकून-ए-दर्द से तस्कीन-ए-मर्ग तक
दिल हो अगर तो लाख हैं पहलू क़रार के