उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shab-e-hangam-e-wahshat kya tan-asani khulegi

शब-ए-हंगाम-ए-वहशत क्या तन-आसानी खुलेगी

شب ہنگام وحشت کیا تن آسانی کھلے گی

शायर: Osaama ameer8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शब-ए-हंगाम-ए-वहशत क्या तन-आसानी खुलेगी
हमारी वज़' की ख़ातिर परेशानी खुलेगी

अभी क्या सा’अत-ए-अव्वल में कुछ ता'लीम होगा
नशा जब हद से बढ़ जाएगा हैरानी खुलेगी

हवा-ए-सुब्ह-ए-ताज़ा किस बदन की मुंतज़िर है
हमें मा'लूम है किस पर फ़रावानी खुलेगी

निहाँ रक्खेंगे हम तुम अपने अपने मौसमों को
जो ठहराओ नहीं आया तो अर्ज़ानी खुलेगी

हमारी ख़ाक को ख़ाक-ए-रवाँ रक्खा गया है
ये जितना नम रहेगी उतनी आसानी खुलेगी

गुज़र जाएँगे हम जो उस गली से एक पल में
तो हम पर ज़िंदगी भर की पशेमानी खुलेगी

सब अपनी अपनी दुनिया में बहुत ही मुतमइन हैं
मगर वो लोग कम हैं जिन पे वीरानी खुलेगी

हज़ारों रंग में है वो गुल-ए-ताज़ा कि जो है
प क़िस्मत से ही इक लम्हा को 'उर्यानी खुलेगी