उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sauda-e-ishq yun bhi utarna to hai nahin

सौदा-ए-इश्क़ यूँ भी उतरना तो है नहीं

سودائے عشق یوں بھی اترنا تو ہے نہیں

शायर: Parvez Sahir10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सौदा-ए-इश्क़ यूँ भी उतरना तो है नहीं
ये ज़ख़्म-ए-रूह है इसे भरना तो है नहीं

सौ बार आइना भी जो देखें तो फ़ाएदा
सूरत को ख़ुद-बख़ुद ही सँवरना तो है नहीं

मुझ को ख़बर है दहर में ज़िंदा रहूँगा मैं
'बुल्ल्हे' की तरह मर के भी मरना तो है नहीं

जिस लहर को निगल गई इक लहर दूसरी
उस लहर को दोबारा उभरना तो है नहीं

तू जो यक़ीन कर ले कि वो है तो फिर वो है
शय का वुजूद अस्ल में वर्ना तो है नहीं

धरनाई की तरह से जो धरना भी दूँ तो क्या
धरती पे उस ने फिर भी उतरना तो है नहीं

करता हूँ ख़ुद ही मबहस ओ तक़रीर से गुरेज़
तर्क-ए-त'अल्लुक़ आप से करना तो है नहीं

वो जिस को अपने-आप से लगता नहीं है डर
उस को ख़ुदा की ज़ात से डरना तो है नहीं

क्यूँ उस के इंतिज़ार में बैठा हूँ देर से?
इस रह-गुज़र से उस ने गुज़रना तो है नहीं

'साहिर' ये मेरा दीदा-ए-गिर्यां है और मैं
सहरा में कोई दूसरा झरना तो है नहीं