उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sar-e-falak hai ki zer-e-zamin pata na chala

सर-ए-फ़लक है कि ज़ेर-ए-ज़मीं पता न चला

سر فلک ہے کہ زیر زمیں پتہ نہ چلا

शायर: Badnam Nazar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सर-ए-फ़लक है कि ज़ेर-ए-ज़मीं पता न चला
तिरा वजूद तो है पर कहीं पता न चला

कहाँ चले गए वो बोरिया-नशीं आख़िर
तुम्हें तो कुछ भी ऐ मसनद-नशीं पता न चला

फ़लक का बोझ ज़मीं ने उठा लिया लेकिन
फ़लक से भी है उठी ये ज़मीं पता न चला

तुम्हारे कूचे तक आया था एक आवारा
फिर उस के बा'द तो उस का कहीं पता न चला

वो तेरा दर था कि काशी कि ख़ाना-ए-का’बा
कहाँ झुकाई थी मैं ने जबीं पता न चला

'अजीब थी वो शब-ए-वस्ल भी 'नज़र' जिस में
वो मेरे पास भी था या नहीं पता न चला

सड़क की भीड़ ने इस तरह मुझ को नोचा था
कहाँ थी जेब कहाँ आस्तीं पता न चला