उर्दू शायरी · ग़ज़ल

samundar ka tamasha kar raha hun

समुंदर का तमाशा कर रहा हूँ

سمندر کا تماشہ کر رہا ہوں

शायर: Bakhsh Layalpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

समुंदर का तमाशा कर रहा हूँ
मैं साहिल बन के प्यासा मर रहा हूँ

अगरचे दिल में सहरा-ए-तपिश है
मगर मैं डूबने से डर रहा हूँ

मैं अपने घर की हर शय को जला कर
शबिस्तानों को रौशन कर रहा हूँ

वही लाए मुझे दार-ओ-रसन पर
मैं जिन लोगों का पैग़म्बर रहा हूँ

वही पत्थर लगा है मेरे सर पर
अज़ल से जिस को सज्दे कर रहा हूँ

तराशे शहर मैं ने 'बख़्श' क्या क्या
मगर ख़ुद ता-अबद बे-घर रहा हूँ