उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ataq-e-shab mein sahar ke charagh raushan kar

अताक़-ए-शब में सहर के चराग़ रौशन कर

اطاق شب میں سحر کے چراغ روشن کر

शायर: Bakhsh Layalpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अताक़-ए-शब में सहर के चराग़ रौशन कर
क़बा-ए-दिल ही नहीं दिल के दाग़ रौशन कर

किसी तरीक़ से ताज़ा हवा गिरफ़्त में ला
किसी सबील से अपना दिमाग़ रौशन कर

मशाम-ए-जाँ में बसा ख़ैर-ओ-अम्न की ख़ुशबू
फिर इस महक से मोहब्बत के बाग़ रौशन कर

छिड़क के ख़ून रग-ए-दिल हक़ीर ज़र्रों पर
सवाद-ए-मंज़िल-ए-जाँ के सुराग़ रौशन कर

सलीब उठा के कभी कूचा-ए-सितम में भी चल
जुनूँ की लौ से भी दश्त-ए-चराग़ रौशन कर

रह-ए-हयात में वहम-ओ-गुमाँ के साए हैं
नज़र में अज़्म-ओ-यक़ीं के अयाग़ रौशन कर

कभी तक़द्दुस-ए-इंसान के तू गीत भी गा
कभी तो दिल में मोहब्बत की आग रौशन कर