उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sahra ka safar tha to shajar kyun nahin aaya

सहरा का सफ़र था तो शजर क्यूँ नहीं आया

صحرا کا سفر تھا تو شجر کیوں نہیں آیا

शायर: Zafar Iqbal Zafar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सहरा का सफ़र था तो शजर क्यूँ नहीं आया
माँगी थीं दुआएँ तो असर क्यूँ नहीं आया

देखा था जिसे हम ने कभी शौक़-ए-तलब में
महताब सा वो चेहरा नज़र क्यूँ नहीं आया

हम लोग तो मरते रहे क़िस्तों में हमेशा
फिर भी हमें जीने का हुनर क्यूँ नहीं आया

लगता है मुक़द्दर में मिरे साया नहीं है
मुद्दत से सफ़र में हूँ तो घर क्यूँ नहीं आया

जिस के लिए बैठे थे बिछाए हुए आँखें
महफ़िल में अभी तक वो बशर क्यूँ नहीं आया

मौसम तो हर इक शाख़ के खुलने का 'ज़फ़र' था
फिर उन पे कोई बर्ग-ओ-समर क्यूँ नहीं आया