उर्दू शायरी · ग़ज़ल

safar ka shauq na manzil ki justuju baqi

सफ़र का शौक़ न मंज़िल की जुस्तुजू बाक़ी

سفر کا شوق نہ منزل کی جستجو باقی

शायर: Aabid Adeeb7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सफ़र का शौक़ न मंज़िल की जुस्तुजू बाक़ी
मुसाफ़िरों के बदन में नहीं लहू बाक़ी

तमाम रात हवाओं का गश्त जारी था
सवेरे तक न रहा कोई हू-ब-हू बाक़ी

सभी तरह से तआ'रुफ़ तो हो गया उन का
रही है अब तो मुलाक़ात रू-ब-रू बाक़ी

जो भीड़ बिखरे तो देखूँ तलब ये कैसी है
दयार-ए-ग़ैर में है किस की जुस्तुजू बाक़ी

वही नज़ारे वही गर्मी-ए-सुख़न है मगर
न ही वो बात न वो तर्ज़-ए-गुफ़्तुगू बाक़ी

ज़माना मुझ से जुदा हो गया ज़माना हुआ
रहा है अब तो बिछड़ने को मुझ से तू बाक़ी

उसी लिहाज़ का 'आबिद' मलाल है हम को
रहा न आज जो दौरान-ए-गुफ़्तुगू बाक़ी