उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main apne jism mein kuchh is tarah se bikhra hun

मैं अपने जिस्म में कुछ इस तरह से बिखरा हूँ

میں اپنے جسم میں کچھ اس طرح سے بکھرا ہوں

शायर: Aabid Adeeb6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं अपने जिस्म में कुछ इस तरह से बिखरा हूँ
कि ये भी कह नहीं सकता मैं कौन हूँ क्या हूँ

उन्हें ख़ुशी है इसी बात से कि ज़िंदा हूँ
मैं उन की दाएँ हथेली की एक रेखा हूँ

मैं पी गया हूँ कई आँसुओं के सैल-ए-रवाँ
मैं अपने दिल को समुंदर बनाए बैठा हूँ

वो मेरे दोस्त जो एक एक कर के दूर हुए
मैं उन को आज भी अपने क़रीब पाता हूँ

मुहीत करने की कोशिश फ़ुज़ूल है मुझ को
नदी का छोर नहीं हूँ मैं बहता दरिया हूँ

मुझी पे फेंके है पत्थर जो कोई आता है
कि जैसे मैं तिरी खिड़की का कोई शीशा हूँ