उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pardes mein hun aur ghani tirgi to hai

परदेस में हूँ और घनी तीरगी तो है

پردیس میں ہوں اور گھنی تیرگی تو ہے

शायर: Aabid Adeeb6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

परदेस में हूँ और घनी तीरगी तो है
पर मुतमइन हूँ रात तिरे शहर की तो है

धरती पे आ रहेंगी अभी सब बुलंदियाँ
चट्टान धीरे धीरे खिसकने लगी तो है

इस का तो ग़म नहीं कि मुख़ालिफ़ सभी हुए
चुभती हुई सी बात भी हम ने कही तो है

फैला के हाथ पैर न सो जाए चाँदनी
साहिल है रुत जवान है और रात भी तो है

खोलो न खिड़कियाँ कि सवेरा नहीं हुआ
बुझते हुए दिए हैं अभी रौशनी तो है

तन्हाई में ये कौन है चौंका गया मुझे
वो आदमी नहीं न सही पर कोई तो है