उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sab munafiq hi nazar aate hain baatil ke siwa

सब मुनाफ़िक़ ही नज़र आते हैं बातिल के सिवा

سب منافق ہی نظر آتے ہیں باطل کے سوا

शायर: Ejaz Parwana9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सब मुनाफ़िक़ ही नज़र आते हैं बातिल के सिवा
हैं सभी शाद मिरे क़त्ल पे क़ातिल के सिवा

अश्क आँखों से गुनाहों की नदामत में बहे
तब भँवर से न कहीं पहुँचा मैं साहिल के सिवा

ख़्वाब देखो है तरक़्क़ी की ज़मानत बे-शक
सब को ता'बीर मगर मिलती है काहिल के सिवा

मसलकी झगड़े फ़ुरूई ये मसाइल को लिए
आग आलिम ही लगाते हैं ये जाहिल के सिवा

होश में मय वो तसव्वुफ़ की ही पीने से रहे
होश वाले सभी ग़फ़्लत में थे ग़ाफ़िल के सिवा

हम पे इल्ज़ाम जो ग़द्दार-ए-वतन का धरते
और हो सकते नहीं वो कोई बुज़दिल के सिवा

चापलूसी से रिया-कारी से बे-ग़ैरती से
तुम बनोगे सभी कुछ रहबर-ए-कामिल के सिवा

भूक शोहरत की तुझे देख न गुमनाम करे
काम कर नाम भी होगा तिरा हासिल के सिवा

शिकवा हर दम ही तअ'स्सुब का न 'परवाना' करो
तुम हो क़ाबिल तो मिले कुछ भी न मंज़िल के सिवा