उर्दू शायरी · ग़ज़ल

musibat ke bhanwar mein bhi shanawar wo sanbhalta hai

मुसीबत के भँवर में भी शनावर वो सँभलता है

مصیبت کے بھنور میں بھی شناور وہ سنبھلتا ہے

शायर: Ejaz Parwana7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुसीबत के भँवर में भी शनावर वो सँभलता है
यक़ीं हो जिस को ख़ुद पर वो तलातुम से निकलता है

हथेली की लकीरों से नुजूमी की ही बातों से
निकम्मा और काहिल तो ख़ुशी से बस उछलता है

वफ़ा की राह में हमदम ग़रीबी हो गई हाइल
तुझे पाने की ख़्वाहिश में मिरा तो दिल मचलता है

हवाओं से न घबराओ चराग़ों को जलाने दो
शुजा'अत देख कर अपनी 'अदू का दिल दहलता है

गए वो दिन बनी-आदम कहा करते थे सच हर दम
ज़बाँ को हज़रत-ए-इंसाँ लिबासों सा बदलता है

सराबों में न पानी है हक़ीक़त ये पुरानी है
मगर रहबर हमारा क्यों नहीं रस्ता बदलता है

अना की तुम परस्तिश को उसूलों में गिनाते हो
ये 'परवाना' मगर बस इंकिसारी से पिघलता है