उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ruKH-e-arzu par hijab-e-mohabbat

रुख़-ए-आरज़ू पर हिजाब-ए-मोहब्बत

رخ آرزو پر حجاب محبت

शायर: Vafa Barahi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रुख़-ए-आरज़ू पर हिजाब-ए-मोहब्बत
खिला और इस से शबाब-ए-मोहब्बत

सिवा यास के मैं ने देखा न कुछ भी
उठाई जब उस ने नक़ाब-ए-मोहब्बत

शिकस्ता हुआ साज़-ए-हस्ती हमारा
न छेड़े कोई अब रबाब-ए-मोहब्बत

हमारी फ़ुग़ाँ की रसाई हो क्यूँकर
कि ऊँची बहुत है जनाब-ए-मोहब्बत

नहीं कुछ भी तासीर मेरी दुआ में
ये शायद है अह्द-ए-शबाब-ए-मोहब्बत

उठाता हूँ आज़ार मैं दिल लगा कर
ब-ता'बीर-ए-हसरत ब-ख़्वाब-ए-मोहब्बत

'वफ़ा' कू-ए-उल्फ़त से हरगिज़ न हटना
मिलेगा यहीं तुम को बाब-ए-मोहब्बत