उर्दू शायरी · ग़ज़ल

marne ki aarzu mein mujhe pech-o-tab hai

मरने की आरज़ू में मुझे पेच-ओ-ताब है

مرنے کی آرزو میں مجھے پیچ و تاب ہے

शायर: Vafa Barahi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मरने की आरज़ू में मुझे पेच-ओ-ताब है
अब ज़िंदगी भी बाइ'स-ए-सद-इज़्तिराब है

मौज-ए-ख़लिश ने ले के ये आग़ोश में कहा
दरिया-ए-आरज़ू भी ब-रंग-ए-सराब है

सहरा में ख़ाक उड़ाने की हाजत नहीं मुझे
मुझ से मिरे जुनूँ को भी अब इज्तिनाब है

पूछो न हाल-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार ऐ 'वफ़ा'
नक़्श-ए-सुकूँ भी माइल-ए-सद-इंक़लाब है