उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bahlaenge firaq mein dil ko fughan se hum

बहलाएँगे फ़िराक़ में दिल को फ़ुग़ाँ से हम

بہلائیں گے فراق میں دل کو فغاں سے ہم

शायर: Vafa Barahi13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बहलाएँगे फ़िराक़ में दिल को फ़ुग़ाँ से हम
तस्कीन पाएँगे तो उसी दास्ताँ से हम

हैं वुसअत-ए-ख़याल तिरी ये इनायतें
आज़ाद हो गए हैं जो क़ैद-ए-मकाँ से हम

फूलों के आस-पास थे काँटे भी सैंकड़ों
मायूस-ओ-ना-मुराद फिरे गुल्सिताँ से हम

मजबूरी-ए-फ़िराक़ ने मा'ज़ूर कर दिया
लाएँ ख़याल-ए-ज़ब्त-ए-मोहब्बत कहाँ से हम

फिर वहशत-ए-ख़याल ने आग़ोश में लिया
ऐ ग़ैरत-ए-शकेब चले अब यहाँ से हम

पूछा जो उस ने हाल तो ख़ामोश हो गए
तशरीह-ए-दर्द कर न सके कुछ ज़बाँ से हम

गिर कर चमन को बर्क़ ने ताराज कर दिया
निकले थे क्या समझ के अभी आशियाँ से हम

जो कारवाँ था वादी-ए-उल्फ़त में रहनुमा
आख़िर बिछड़ के रह गए उस कारवाँ से हम

उट्ठे जबीन-ए-शौक़ ये अम्र-ए-मुहाल है
कुछ फ़ैज़ पा रहे हैं तिरे आस्ताँ से हम

जल्वे का इक़्तिदार है ज़ौक़-ए-निगाह पर
देखें किसी के हुस्न को हट कर जहाँ से हम

बर्क़-ए-शरर-नवाज़ भी शर्मा के रह गई
इस बेबसी के साथ चले आशियाँ से हम

पहुँचा न कोशिशों पे किसी का ख़याल भी
कितने बुलंद-तर रहे वहम-ओ-गुमाँ से हम

यूँ इंतिख़ाब-ए-ज़ौक़-ए-मोहब्बत मुहाल था
इक गुल भी ले सके न 'वफ़ा' गुल्सिताँ से हम