उर्दू शायरी · ग़ज़ल

roz ek hangama-e-Khaali uTha jate hain din

रोज़ इक हंगामा-ए-ख़ाली उठा जाते हैं दिन

روز اک ہنگامۂ خالی اٹھا جاتے ہیں دن

शायर: Osaama ameer8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रोज़ इक हंगामा-ए-ख़ाली उठा जाते हैं दिन
और हम बेकार में सारा बिता जाते हैं दिन

क्यों हम इस अम्बोह में दिल का लहू करते रहें
ख़ाक में सारी तमन्नाएँ मिला जाते हैं दिन

लम्हा-लम्हा अपना शीराज़ा बहम करते हैं हम
कैसे कैसे आदमी को कैसा खा जाते हैं दिन

क़र्ज़ बढ़ता जा रहा है सा’अत-ए-फ़र्दा का और
एक दिन गुज़रा नहीं है और आ जाते हैं दिन

हँसते हँसते ध्यान कब होता है आँखों पर हमें
इक ज़रा सी देर लगती है रुला जाते हैं दिन

'उम्र के पच्चीसवें हिस्से में ये हासिल हुआ
राएगाँ जाने से पहले ही बिता जाते हैं दिन

सर-बसर हम वहशत-ए-आइंदा-ओ-इमरोज़ हैं
ऐसे बे-हालत को अक्सर क्यों दुखा जाते हैं दिन

अब कहाँ वो महफ़िल-ए-बादा वो सरमस्ती 'अमीर'
बस घड़ी भर के लिए मेहमान आ जाते हैं दिन