उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rishte-nate kho gae sab ganw ka ghar kho gaya

रिश्ते-नाते खो गए सब गाँव का घर खो गया

رشتے ناطے کھو گئے سب گاؤں کا گھر کھو گیا

शायर: Qamar Siddiqi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रिश्ते-नाते खो गए सब गाँव का घर खो गया
रेल की सीटी बजी और सारा मंज़र खो गया

चलते फिरते लोग सड़कें ज़िंदगी आवारगी
हर नज़ारा एक दिन दिल से निकल कर खो गया

रात मैं ने ख़्वाब देखा ख़्वाब की ता'बीर भी
इक परिंदा छत पे बैठा और उड़ कर खो गया

कुछ नहीं अब आइने में साफ़ धुँदला कुछ नहीं
अक्स की आँखों में जो होता था तेवर खो गया

उन सभी हैरान बच्चों की तरह हैं हम 'क़मर'
वक़्त के इस मेले में जिन का मुक़द्दर खो गया

खो गए इस बार मेरे ख़्वाब सारे धुंद में
और अब के रेत में ये मेरा बिस्तर खो गया