उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rakkha sanjo ke gauhar-e-nayab ki tarah

रक्खा संजो के गौहर-ए-नायाब की तरह

رکھا سنجو کے گوہر نایاب کی طرح

शायर: Tabassum Azmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रक्खा संजो के गौहर-ए-नायाब की तरह
सौंपी थी जो बुज़ुर्गों ने आदाब की तरह

उठते ही उन के हर्फ़ भी सारे बिखर गए
जिन का वजूद घर में था एराब की तरह

कुछ खुरदुरे से धागे भी चादर में उस की हैं
कब ज़िंदगी है रेशम-ओ-कम-ख़्वाब की तरह

दुख ही नहीं हैं ज़हर-ए-हलाहल फ़क़त यहाँ
सुख भी मिला है बारहा ज़हराब की तरह

अक्सर हुआ है ऐसा कि छोटी सी मौज भी
सब कुछ बहा के ले गई सैलाब की तरह