उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rah jati hai har chiz jahan sae mein Dhal kar

रह जाती है हर चीज़ जहाँ साए में ढल कर

رہ جاتی ہے ہر چیز جہاں سائے میں ڈھل کر

शायर: Urfi Aafaqi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रह जाती है हर चीज़ जहाँ साए में ढल कर
वो देस भी इक बार ज़रा देखिए चल कर

हम क़ाफ़िला-ए-फ़िक्र बढ़ा ले गए आगे
आई जो सदा दश्त-ए-ज़ियाँ में कि अमल कर

उफ़्तादा-ए-रह की नहीं सुनता कोई फ़रियाद
आता है जो बढ़ जाता है पैरों से कुचल कर

हर रौज़न-ए-दीवार से हैं घूरती आँखें
इस ख़ौफ़ के ज़िंदाँ से कहाँ जाएँ निकल कर

सैराब तो होती हैं किसी अक्स से आँखें
आती है कोई मौज तहों से तो उछल कर

सद-हैफ़ कि ज़ाएअ' दिल-ए-इंसाँ पे हो वो आग
जिस आग से कोहसार भी रह जाएँ पिघल कर