उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jine ke Dhab jab aae to marna paDa mujhe

जीने के ढब जब आए तो मरना पड़ा मुझे

جینے کے ڈھب جب آئے تو مرنا پڑا مجھے

शायर: Urfi Aafaqi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जीने के ढब जब आए तो मरना पड़ा मुझे
किस ग़म से रम किया कि ठहरना पड़ा मुझे

मैं और अपनी जान का दुश्मन नहीं नहीं
ऐसी ही वो अदा थी जो मरना पड़ा मुझे

कुछ ख़ुद मुझे उभार गई रिफ़अत-ए-जमाल
कुछ आप पस्तियों से उभरना पड़ा मुझे

हालाँकि अपने आप से मैं दूर भी न था
कितने ही रास्तों से गुज़रना पड़ा मुझे

ग़ुंचे की तरह शब क़फ़स-ए-रंग-ओ-बू रहा
मानिंद-ए-गुल सहर को बिखरना पड़ा मुझे

अपने ही हाथों आप को खींचा सलीब पर
मातम भी अपना आप ही करना पड़ा मुझे

फिर क्या जो मैं ज़मीं से गया ता-ब-आसमाँ
आख़िर इसी ज़मीं पे उतरना पड़ा मुझे

क्या ढूँडते हो अब मिरे लब पर शगुफ़्तगी
इक ज़ख़्म था कि ख़ुद जिसे भरना पड़ा मुझे

'उर्फ़ी' सुनाओ मुज़्दा मिरे ख़ैर-ख़्वाह को
बिगड़ा ज़माना ये कि सुधरना पड़ा मुझे