उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raat ko dip ki lau kam nahin rakkhi jati

रात को दीप की लौ कम नहीं रक्खी जाती

رات کو دیپ کی لو کم نہیں رکھی جاتی

शायर: Tahzeeb Hafi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रात को दीप की लौ कम नहीं रक्खी जाती
धुंध में रौशनी मद्धम नहीं रक्खी जाती

कैसे दरिया की हिफ़ाज़त तिरे ज़िम्मे ठहराऊँ
तुझ से इक आँख अगर नम नहीं रक्खी जाती

इस लिए छोड़ के जाने लगे सब चारा-गराँ
ज़ख़्म से इज़्ज़त-ए-मरहम नहीं रक्खी जाती

मेरे अश्कों की मदद चाहिए बतलाओ मुझे
कौन से फूल पे शबनम नहीं रक्खी जाती

ऐसे कैसे मैं तुझे चाहने लग जाऊँ भला
घर की बुनियाद तो इक दम नहीं रक्खी जाती