उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qabila ishq ka mere KHilaf ho raha tha

क़बीला इश्क़ का मेरे ख़िलाफ़ हो रहा था

قبیلہ عشق کا میرے خلاف ہو رہا تھا

शायर: Tahir Baloch6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़बीला इश्क़ का मेरे ख़िलाफ़ हो रहा था
रिवायतों से बड़ा इंहिराफ़ हो रहा था

फिर एक हिज्र का एहराम ला थमाया गया
दयार-ए-वस्ल का पहला तवाफ़ हो रहा था

क़बा-ए-ज़र्द ने पैरों को ढाँप रक्खा था
बरहना शाख़ पे मौसम ग़िलाफ़ हो रहा था

ये दस्तकें मिरी बुनियाद तक हिला रही थीं
कि जिस्म-ओ-जान में जैसे शिगाफ़ हो रहा था

कई बलाओं ने घेरे में ले लिया था मुझे
किसी की याद का जब एतकाफ़ हो रहा था

ये वक़्त रुक गया 'ताहिर' मिरे दरीचे पर
सवेरे होने का यूँ ए'तिराफ़ हो रहा था