उर्दू शायरी · ग़ज़ल

phir mujhe kaun-o-makan dasht-o-bayaban se lage

फिर मुझे कौन-ओ-मकाँ दश्त-ओ-बयाबाँ से लगे

پھر مجھے کون و مکاں دشت و بیاباں سے لگے

शायर: Ehsan Akbar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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फिर मुझे कौन-ओ-मकाँ दश्त-ओ-बयाबाँ से लगे
ख़ुद को देखा है तो आईने परेशाँ से लगे

वक़्त कटता रहा था अहद-ए-हुज़ूरी कि फ़िराक़
ज़ख़्म लगते रहे चाहे किसी उनवाँ से लगे

ज़िंदगी मेरे इज़ाफ़े मुझे वापस कर दे
झाड़ दे ख़ार जो नाहक़ तिरे दामाँ से लगे

कुछ तो थी सादगी कुछ बे-ख़बरी बे-हुनरी
कुछ हमें इश्क़ के हंगामे भी आसाँ से लगे

ज़ीस्त हम हार के भी हाथ मिलाएँ तुझ से
अपने ये हौसले कितने तुझे अर्ज़ां से लगे