उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pari safar mein ramaq tak nahin gai hogi

परी सफ़र में रमक़ तक नहीं गई होगी

پری سفر میں رمق تک نہیں گئی ہوگی

शायर: Vasaf Basit7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

परी सफ़र में रमक़ तक नहीं गई होगी
मुझे पता है धनक तक नहीं गई होगी

ये आसमान जो मा'मूल के मुताबिक़ है
ज़मीं की चीख़ फ़लक तक नहीं गई होगी

नज़र में आती हुई तीरगी ख़लाओं बीच
ये रौशनी भी चमक तक नहीं गई होगी

उसे ख़बर है तबीअ'त ही मेरी ऐसी है
मुझे यक़ीं है वो शक तक नहीं गई होगी

ये लफ़्ज़ यूँही पिघलते रहेंगे काग़ज़ पर
ये आग शहर-ए-ख़ुनक तक नहीं गई होगी

फिर आसमान का मंज़र जला हुआ देखा
किसी की आँख परख तक नहीं गई होगी

वो फिर ख़मोश निगाहें लिए हुए 'बासित'
मिरी किसी भी झलक तक नहीं गई होगी