उर्दू शायरी · ग़ज़ल

palken nind se bojhal hain ya ab manzar ki tab nahin

पलकें नींद से बोझल हैं या अब मंज़र की ताब नहीं

پلکیں نیند سے بوجھل ہیں یا اب منظر کی تاب نہیں

शायर: Faisal Azeem6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पलकें नींद से बोझल हैं या अब मंज़र की ताब नहीं
क्यों इन जलती आँखों में अब रंग-बिरंगे ख़्वाब नहीं

इक मुद्दत से किस नातिक़ की नोक-ए-ज़बाँ पर अटका हूँ
मैं इक लफ़्ज़ हूँ गोया वो भी मा'नी से सैराब नहीं

आँखें हैं या ख़ार-ए-मुग़ीलाँ चेहरा है या सहरा है
लफ़्ज़ बहुत नायाब हैं प्यारे दर्द मगर नायाब नहीं

मेरी बला से झुकने वालों में मा'बूद भी शामिल हों
लेकिन मिरे सज्दों में बुत-ख़ाने के आदाब नहीं

फ़ितरत का पैग़म्बर क्या जाने समझौते की बातें
दरिया मुड़ सकते हैं लेकिन दरिया के सैलाब नहीं

आँखें और चुनेंगी कब तक आख़िर मंज़र की किर्चें
मुझ में तो अब जैसे अपनी नज़रों की भी ताब नहीं