उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahunche jo manzil-e-maqsud pe pakke nikle

पहुँचे जो मंज़िल-ए-मक़्सूद पे पक्के निकले

پہنچے جو منزل مقصود پہ پکے نکلے

शायर: Aarif Dehelwi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहुँचे जो मंज़िल-ए-मक़्सूद पे पक्के निकले
रह गए वो जो तिरी राह में कच्चे निकले

देख कर मुझ को 'अदू बज़्म से फूटे निकले
जिन को मीठा मैं समझता रहा कड़वे निकले

भीड़ में अब ग़म-ए-दुनिया के फँसा हूँ मैं भी
मैं भी निकलूँगा कोई और तो सरके निकले

ना-ख़ुदा ने तो फँसा दी थी भँवर में कश्ती
नाम जब हम ने ख़ुदा का लिया कैसे निकले

ये मिला मुझ को मिरी दश्त-नवर्दी का सिला
मुद्दतों बा'द मिरे पाँव से काँटे निकले

फिर वो जाते हैं बहुत दूर किसी और तरफ़
तेरे 'आशिक़ वो जो बुत-ख़ाने से निकले निकले

तौबा करते रहे पीते भी रहे हाथ के हाथ
बादा-कश साक़िया मयख़ाने के सुर्ते निकले

सब से आगे थे जो कल उफ़ रे तग़य्युर कि वही
आज दुनिया की हर इक दौड़ में पीछे निकले

नुक़्स 'आरिफ़' था परख में कि हक़ीक़त थी यही
जिस क़दर सिक्के खरे देखे थे खोटे निकले