उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nikhar sanwar kar kisi ka joban phaban ke sanche mein Dhal raha hai

निखर सँवर कर किसी का जोबन फबन के साँचे में ढल रहा है

نکھر سنور کر کسی کا جوبن پھبن کے سانچے میں ڈھل رہا ہے

शायर: Pandit Tribhuvannath Zutshi Zar Dehlvi3 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

निखर सँवर कर किसी का जोबन फबन के साँचे में ढल रहा है
जवानी अंगड़ाई ले रही है शबाब करवट बदल रहा है

ख़ला-मला हो के ग़ैर से कोई मूँग छाती पे दल रहा है
किसी के अरमान बुझ रहे हैं किसी का अरमाँ निकल रहा है

तनी भंवें हैं खिंची है चितवन कड़े हैं तेवर जबीं पे है बल
न जाने किस पर गिरेगी बिजली कि शो'ला ख़ंजर उगल रहा है