उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nazar ko waqf-e-jamal kar ke na zikr kar lutf-e-zindagi ka

नज़र को वक़्फ़-ए-जमाल कर के न ज़िक्र कर लुत्फ़-ए-ज़िंदगी का

نظر کو وقف جمال کر کے نہ ذکر کر لطف زندگی کا

शायर: Vafa Barahi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नज़र को वक़्फ़-ए-जमाल कर के न ज़िक्र कर लुत्फ़-ए-ज़िंदगी का
हुसूल-ए-मक़्सद जहाँ में मुश्किल यहाँ हुआ कौन कब किसी का

उसी की अब तक नवा-ए-रंगीं बनी हुई है हयात-ए-इंसाँ
सुकूत-ए-पैहम के बाद तू ने जो साज़ छेड़ा था ज़िंदगी का

जुनून-ए-फ़ितरत भी पल रहा था नुक़ूश-ए-हसरत उभर रहे थे
नवेद-ए-उल्फ़त को सुन के चौंके करम था शायद ये बे-ख़ुदी का

कभी न आँखों से अश्क निकले कभी न शिकवा ज़बाँ पे आया
यक़ीन है तुम तड़प उठोगे कहूँगा जब हाल बेबसी का

उसी के सुनने की है तमन्ना 'वफ़ा' उसी की मुझे हवस है
नवा-ए-उल्फ़त के साथ उस ने जो साज़ छेड़ा था ज़िंदगी का