उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nashat-e-wasl ke hangame kab nahin rakhta

नशात-ए-वस्ल के हंगामे कब नहीं रखता

نشاط وصل کے ہنگامے کب نہیں رکھتا

शायर: Osaama ameer7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नशात-ए-वस्ल के हंगामे कब नहीं रखता
मैं कोई शय भी यहाँ बे-तलब नहीं रखता

मुझे पता हैं तिरी बरहमी के सारे सबब
मुझे ख़बर है तू कुछ बे-सबब नहीं रखता

हमारा यार है हस्सास इस मु’आमले में
अदब के साथ कोई बे-अदब नहीं रखता

हमेशा हुस्न को देखा गया है दाद-तलब
मगर वो हुस्न तो कोई तलब नहीं रखता

फ़सील-ए-दिल की मुंडेरों पे वो चराग़ मिरे
जब उस की चाह नहीं होती तब नहीं रखता

जुनूँ-नज़ाद है तिमसाल-ए-आइना मेरा
सो अपने आप में क्या क्या ग़ज़ब नहीं रखता

उसे ख़बर है कि रखना है क्या नहीं रखना
सो जो भी हाथ लगे सब का सब नहीं रखता