उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mumkin hai ab faza-e-sahar bolne lage

मुमकिन है अब फ़ज़ा-ए-सहर बोलने लगे

ممکن ہے اب فضائے سحر بولنے لگے

शायर: Urooj Zaidi Badayuni10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुमकिन है अब फ़ज़ा-ए-सहर बोलने लगे
फ़ितरत ख़ुद अपने राज़-ए-निहाँ खोलने लगे

फूलों को लोग काँटों पे जब तोलने लगे
घबरा के सारे अहल-ए-चमन बोलने लगे

हम उस ख़ुलूस-ए-कुफ़्र-ओ-यक़ीं के हैं मुंतज़िर
जब रौशनी से रात भी सच बोलने लगे

हैरत-असर है हुस्न-ए-समा’अत का मो'जिज़ा
तस्वीर मेरे कानों में रस घोलने लगे

क्यों नाख़ुदा को क़ादिर-ए-तूफ़ाँ समझ लिया
ये क्या करेगा नाव अगर डोलने लगे

दुनिया हमारे हर्फ़-ए-मुदल्लल पे है ख़मोश
हम चुप रहें तो सारा जहाँ बोलने लगे

तारों की ख़ैर तारों भरे आसमाँ की ख़ैर
अब हम इन्हें भी मिस्ल-ए-गुहर रोलने लगे

ख़ुद-आगही की क़ुव्वत-ए-पर्वाज़ देख कर
असरार-ए-काएनात भी पर तोलने लगे

इस तजरबे के वास्ते इक ‘उम्र चाहिए
अल्फ़ाज़ साथ छोड़ दें दिल बोलने लगे

हुस्न-ए-कलाम तिश्ना-ए-तकमील है 'उरूज'
जब तक न अपने मुँह से हुनर बोलने लगे