उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujrim hun agar mujhko saza kyon nahin dete

मुजरिम हूँ अगर मुझ को सज़ा क्यों नहीं देते

مجرم ہوں اگر مجھ کو سزا کیوں نہیں دیتے

शायर: Danish Ejaz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुजरिम हूँ अगर मुझ को सज़ा क्यों नहीं देते
अपना हूँ तो फिर मुझ को सदा क्यों नहीं देते

कुछ और नहीं शिकवा शिकायत ही करो तुम
इस बुझती मोहब्बत को हवा क्यों नहीं देते

तुम लौट भी जाओ तो असर देर तलक हो
मलते हुए ये हाथ दबा क्यों नहीं देते

फिर देख के साहब जी उसी ख़ास नज़र से
उम्मीद के ग़ुंचों को खिला क्यों नहीं देते

इक बात ही कहनी है मगर लोग बहुत हैं
कुछ वक़्त मुझे इन के सिवा क्यों नहीं देते