उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mohabbaton ki masafat se kaT ke dekhte kya

मोहब्बतों की मसाफ़त से कट के देखते क्या

محبتوں کی مسافت سے کٹ کے دیکھتے کیا

शायर: Rafique Khayal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मोहब्बतों की मसाफ़त से कट के देखते क्या
मुसाफ़िर-ए-शब-ए-हिज्राँ पलट के देखते क्या

सुरूर-ए-इश्क़ में गुम हो गए थे हम दोनों
हवा-ए-दामन-ए-शब से लिपट के देखते क्या

तिलिस्म-ए-यार रग ओ पय में ढल रहा था, हम
नशात ओ ग़म के सहीफ़े उलट के देखते क्या

बहार-ए-नौ को जनम दे रही थी वस्ल की शब
हम आफ़ियत की रुतों में सिमट के देखते क्या

था सैल-ए-हसरत-ए-दिल दुश्मन-ए-हयात मगर
रह-ए-बक़ा भी उसी में थी हट के देखते क्या