उर्दू शायरी · ग़ज़ल

meri nigah ki kirnon se jab naha jae

मिरी निगाह की किरनों से जब नहा जाए

مری نگاہ کی کرنوں سے جب نہا جائے

शायर: Badnam Nazar10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरी निगाह की किरनों से जब नहा जाए
तुम उस को देखो तो बस देखते रहा जाए

किसी के ग़म के सहारे ही जी लिया जाए
जो ये भी पास न होवे तो क्या किया जाए

तुम्हारे होंटों पे ताले मिरी ज़बान पे मुहर
चलो लता का कोई गीत ही सुना जाए

ये पेड़ बाँझ है मा'लूम है हमें लेकिन
जो फल नहीं हैं तो फिर फूल ही चुना जाए

हक़ीक़तों से तो दिन रात पाला पड़ता है
कभी कभी कोई अफ़्साना भी सुना जाए

न मर ही जाता है वो और न जी ही पाता है
'अजीब शख़्स है बस सूखता चला जाए

ये बढ़ते लोग ये सुकड़ा हुआ हयात का घर
कहो कि अब के किसी और घर ख़ुदा जाए

कभी तो उतरे कोई दिल के सूने आँगन में
पिघलती आँखों में इक ख़्वाब तो समा जाए

बुलंदियों पे तो इक 'उम्र काट दी मैं ने
कभी कभी किसी पस्ती में भी गिरा जाए

हर एक आँख पिघलती ही जाती है 'बदनाम'
हर एक चेहरा धुआँ ही धुआँ हुआ जाए