उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere har lafz ki tauqir rahne ke liye hai

मिरे हर लफ़्ज़ की तौक़ीर रहने के लिए है

مرے ہر لفظ کی توقیر رہنے کے لیے ہے

शायर: Bakhsh Layalpuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरे हर लफ़्ज़ की तौक़ीर रहने के लिए है
मैं वो ज़िंदा हूँ मेरी तहरीर रहने के लिए है

सितम-गर ने जो पहनाई मिरे दस्त-ए-तलब में
ये मत समझो कि वो ज़ंजीर रहने के लिए है

मिरा आईना-ए-तसनीफ़ देता है गवाही
मिरा हर नुक़्ता-ए-तफ़सीर रहने के लिए है

रहेगा तो न तेरा ज़ुल्म पर रोज़-ए-अबद तक
हमारे दर्द की जागीर रहने के लिए है

जिसे मीर निगाहों ने कभी देखा नहीं है
मिरे दिल में वही तस्वीर रहने के लिए है

सर-ए-बातिल किया दो-लख़्त जिस ने भी जहाँ में
सलामत बस वही शमशीर रहने के लिए है

जुनून-ए-शौक़ तख़रीब-ए-जहाँ मिट कर रहेगा
मगर हर जज़्बा-ए-ता'मीर रहने के लिए है

न लिक्खा शे'र कोई और समझ बैठे हैं नादाँ
अदब में हर्बा-ए-तश्हीर रहने के लिए है

गुज़र जाएँगे हम दार-ए-फ़ना से 'बख़्श' लेकिन
हमारे शहर की तासीर रहने के लिए है