उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mil hi jaani thi munasib koi qimat mujhko

मिल ही जानी थी मुनासिब कोई क़ीमत मुझ को

مل ہی جانی تھی مناسب کوئی قیمت مجھ کو

शायर: Varun Gagneja Wahid8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिल ही जानी थी मुनासिब कोई क़ीमत मुझ को
तू ने समझा है मगर माल-ए-ग़नीमत मुझ को

मेरी नींदें ही सबब हैं मिरी बेदारी का
मेरे ख़्वाबों से ही होती है अज़िय्यत मुझ को

एक रिश्ते को बचाने के लिए आठों पहर
करनी पड़ती है अमानत में ख़यानत मुझ को

सोचता हूँ कि निकल आऊँ मैं बाहर घर से
ढूँढती फिरती है कुछ रोज़ से शोहरत मुझ को

मुझ से बढ़ कर ही नहीं कोई भी अब मेरा हरीफ़
ख़ुद से हर वक़्त ही रहती है शिकायत मुझ को

अब तो हर लम्हा झुका है ये अना का पलड़ा
महँगी पड़ने लगी अब मेरी शराफ़त मुझ को

था करम कम ही कहाँ मुझ पे मिरे मालिक का
देखने की ही मिली ना कभी फ़ुर्सत मुझ को

ख़ुद को रख छोड़ा है अब मैं ने हवा पर 'वाहिद'
ले के जाती है किधर देखिए क़िस्मत मुझ को