उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ghaDi har waqt hi bazar mein rahna paDa

हर घड़ी हर वक़्त ही बाज़ार में रहना पड़ा

ہر گھڑی ہر وقت ہی بازار میں رہنا پڑا

शायर: Varun Gagneja Wahid6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर घड़ी हर वक़्त ही बाज़ार में रहना पड़ा
बेचना था ख़ुद को सो अख़बार में रहना पड़ा

एक ही तहरीर को पानी पे लिक्खा बार बार
रहना था बस इस लिए संसार में रहना पड़ा

ख़्वाहिशें तो थीं कि हम बुनियाद का पत्थर बनें
हाए कैसा जुर्म था दीवार में रहना पड़ा

फिर किसी से दोस्ती उस ने न मेरे बाद की
उम्र भर मुझ को भी फिर अग़्यार में रहना पड़ा

वो जो था ख़ुशबू की मानिंद उड़ना जिस का शौक़ था
बेबसी देखो उसे अशआर में रहना पड़ा

हम तसव्वुर कर न पाए 'वाहिद' उस तस्वीर का
रात भर हम को ख़याल-ए-यार में रहना पड़ा