उर्दू शायरी · ग़ज़ल

meri mata-e-soz gham-e-dil nahin raha

मेरी मता-ए-सोज़ ग़म-ए-दिल नहीं रहा

میری متاع سوز غم دل نہیں رہا

शायर: Tabish Dehlvi12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मेरी मता-ए-सोज़ ग़म-ए-दिल नहीं रहा
मैं रोज़गार-ए-शौक़ के क़ाबिल नहीं रहा

कब से ये सर है दोश पर अपने वबाल-ए-दोश
क्या शहर भर में एक भी क़ातिल नहीं रहा

तय की शिकस्त-ए-दिल से रह-ए-इज़्तिराब-ए-दिल
ये मरहला भी ख़ैर से मुश्किल नहीं रहा

देखे हैं चश्म-ए-ग़ैर से 'ऐब-ओ-हुनर तमाम
ख़ुद-आगही से मैं कभी ग़ाफ़िल नहीं रहा

हासिल मुराद कोशिश-ए-मशकूर से नहीं
जादा भी अब वसीला-ए-मंज़िल नहीं रहा

सर-गश्ता रूह-ए-क़ैस अभी तक है दश्त में
हर-चंद वो सवार वो महमिल नहीं रहा

जिस दिन से दी गई है शिकस्त अपने आप को
उस दिन से कोई मद्द-ए-मुक़ाबिल नहीं रहा

पैहम मिली है 'इज़्ज़त-ए-रुस्वाई 'इश्क़ मैं
किस रोज़ ये शरफ़ मुझे हासिल नहीं रहा

सैराब मौज मौज से रहने के बा-वजूद
कब तिश्ना काम बहर से साहिल नहीं रहा

क्या हक़ के हक़ न रहने का शिकवा करे कोई
बातिल भी हक़ तो ये है कि बातिल नहीं रहा

अब हुस्न को है दीदा-ए-मुश्ताक़ की तलाश
शायद इक आइना भी मुक़ाबिल नहीं रहा

'ताबिश' ये ख़ौफ़ है कहीं ख़ंजर ब-कफ़ न हो
गर्दन में अब जो हाथ हमाइल नहीं रहा