उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maut Khaali jagah thi jise koi bharna nahin chahta tha

मौत ख़ाली जगह थी जिसे कोई भरना नहीं चाहता था

موت خالی جگہ تھی جسے کوئی بھرنا نہیں چاہتا تھا

शायर: Tahzeeb Hafi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मौत ख़ाली जगह थी जिसे कोई भरना नहीं चाहता था
उस के चेहरे पे लिक्खा हुआ है वो मरना नहीं चाहता था

क्या बताऊँ कि मैं अब्र हूँ सो मिरी अपनी मजबूरियाँ हैं
वर्ना मैं इन मकानों से हो कर गुज़रना नहीं चाहता था

घोंसलों में पड़े सोचते हैं कि हम उन परिंदों में होते
वो जिन्हें अपने पिंजरों से आज़ाद करना नहीं चाहता था

जो हमें छोड़ कर जा चुके उन को इतना भी क्या याद करना
चश्म-ए-तर एक दो अश्क काफ़ी थे झरना नहीं चाहता था

हम मछेरों ने अपने समुंदर भी बदले मगर कश्तियों पर
रिज़्क़ के नाम का इक परिंदा उतरना नहीं चाहता था

इक पुरानी मसाफ़त की मिट्टी थी चेहरे पे 'तहज़ीब' वर्ना
कौन था जो तिरे आइनों में सँवरना नहीं चाहता था