उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maine ye kab kaha hai ki wo mujhko tanha nahin chhoDta

मैं ने ये कब कहा है कि वो मुझ को तन्हा नहीं छोड़ता

میں نے یہ کب کہا ہے کہ وہ مجھ کو تنہا نہیں چھوڑتا

शायर: Tahzeeb Hafi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं ने ये कब कहा है कि वो मुझ को तन्हा नहीं छोड़ता
छोड़ता है मगर एक दिन से ज़ियादा नहीं छोड़ता

कौन सहराओं की प्यास है इन मकानों की बुनियाद में
बारिशों से अगर बच भी जाएँ तो दरिया नहीं छोड़ता

दूर उम्मीद की खिड़कियों से कोई झाँकता है यहाँ
और मेरे गली छोड़ने तक दरीचा नहीं छोड़ता

मैं जिसे छोड़ कर तुम से छुप कर मिला हूँ अगर आज वो
देख लेता तो शायद वो दोनों को ज़िंदा नहीं छोड़ता

कौन-ओ-इमकान में दो तरह के ही तो शो'बदा-बाज़ हैं
एक पर्दा गिराता है और एक पर्दा नहीं छोड़ता

सच कहूँ मेरी क़ुर्बत तो ख़ुद उस की साँसों का वरदान है
मैं जिसे छोड़ देता हूँ उस को क़बीला नहीं छोड़ता

तय-शुदा वक़्त पर वो पहुँच जाता है प्यार करने वसूल
जिस तरह अपना क़र्ज़ा कभी कोई बनिया नहीं छोड़ता

पहले मुझ पर बहुत भौंकता है कि मैं अजनबी हूँ कोई
और अगर घर से जाने का बोलूँ तो कुर्ता नहीं छोड़ता

लोग कहते हैं तहज़ीब 'हाफ़ी' उसे छोड़ कर ठीक है
हिज्र इतना ही आसान होता तो तौंसा नहीं छोड़ता