उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main kab rahin-e-reg-e-bayaban-e-yas tha

मैं कब रहीन-ए-रेग-ए-बयाबान-ए-यास था

میں کب رہین ریگ بیابان یاس تھا

शायर: Ibrahim Ashk7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं कब रहीन-ए-रेग-ए-बयाबान-ए-यास था
सद-ख़ेमा-ए-बहार मिरे आस पास था

तोड़ा है बार-हा मुझे दिल की शिकस्त ने
चेहरा मगर ज़रा भी न मेरा उदास था

सहरा-ए-जाँ की धूप में थीं वहशतें बहुत
लेकिन न मेरा 'अज़्म कहीं बद-हवास था

ये और बात है कि बरहना थी ज़िंदगी
मौजूद फिर भी मेरे बदन पर लिबास था

मैं ने हर एक लम्हे को चाहा है टूट कर
था ज़िंदगी-परस्त मोहब्बत-शनास था

मौसम कुछ आए ऐसे भी शहर-ए-ख़याल में
मुझ को न जिन का 'इल्म न कोई क़यास था

फ़िक्र-ए-सुख़न ही 'अश्क' है ज़ौक़-ए-अमल मिरा
इस के सिवा न कार-ए-जहाँ कोई रास था