उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mana jaan-kah bahut gham ka nihan rakhna hai

माना जाँ-काह बहुत ग़म का निहाँ रखना है

مانا جانکاہ بہت غم کا نہاں رکھنا ہے

शायर: Tabish Dehlvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

माना जाँ-काह बहुत ग़म का निहाँ रखना है
ग़म का इज़हार तो शो'ले पे ज़बाँ रखना है

बुझते सूरज को हरारत की ज़रूरत होगी
इस लिए ख़ुद को अभी शो'ला-ब-जाँ रखना है

बाब-ए-इंसाफ़ इसी तरह से शायद खुल जाए
अपने हर साँस को सर-गर्म-ए-फ़ुग़ाँ रखना है

खुली आँखों से तो है देखनी दुनिया लेकिन
अपनी जानिब भी तो चश्म-ए-निगराँ रखना है

शोरिश-ए-ग़म से न हो जाए तमन्ना मजरूह
क़र्या-ए-जाँ में मुझे अम्न-ओ-अमाँ रखना है

फ़ैसला अब ये मकीनों ही को करना होगा
घर को घर रखना है या घर को मकाँ रखना है

इस क़दर कू-ए-शब-ओ-रोज़ से ना-वाक़िफ़ हूँ
बार-ए-हस्ती नहीं मा'लूम कहाँ रखना है

लहजा बदले तो बदल जाती है फ़ितरत 'ताबिश'
हम को अपना यही अंदाज़-ए-बयाँ रखना है