उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lab-e-jaan-baKHsh ke miThe ka tere jo maza paya

लब-ए-जाँ-बख़्श के मीठे का तेरे जो मज़ा पाया

لب جاں بخش کے میٹھے کا تیرے جو مزہ پایا

शायर: Baqar Agah Vellori5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लब-ए-जाँ-बख़्श के मीठे का तेरे जो मज़ा पाया
तो चश्मा ज़िंदगी का अपनी लबरेज़-ए-बक़ा पाया

न हुए क्यूँ ब-सद जाँ दिल मिरा मफ़्तूँ तिरा जानाँ
कि हर जल्वे में तेरे यक करिश्मा मैं जुदा पाया

दो-बाला क्यूँ न हो नश्शा दिल-ए-हैराँ की हैरत का
जो तुझ को सब में और तेरे में सब को बरमला पाया

तिरी इक गर्दिश-ए-मिज़्गाँ से यूँ बे-ताब-ओ-ताक़त हूँ
न कह सकता हूँ कुछ गर कोई पूछे तू ने क्या पाया

न दुनिया उस में रह पावे न 'उक़्बा उस को फैलावे
दिल-ए-'आगाह' के कौसर में जिन ने इंज़िवा पाया