उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya hua jo dushmanon ke darmiyan KHanjar chale

क्या हुआ जो दुश्मनों के दरमियाँ ख़ंजर चले

کیا ہوا جو دشمنوں کے درمیاں خنجر چلے

शायर: Badnam Nazar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या हुआ जो दुश्मनों के दरमियाँ ख़ंजर चले
दोस्तों में भी तो अक्सर तंज़ के पत्थर चले

लो फ़रिश्तों के परों की ख़ुशबुएँ लहरा गईं
दिन ढला इस्कूल से बच्चे अब अपने घर चले

साएबाँ-दर-साएबाँ था चीख़ती रूहों का शोर
एक घर घबरा के घर से मेरे बाम-ओ-दर चले

बंद कमरा नीली बत्ती और मिरा तन्हा वजूद
रात-भर दीवार पर रंगीन से मंज़र चले

फिर सड़क पर बन रहे हैं कितने शीशे के मकाँ
देखिए फिर झोंपड़ों से कब कोई पत्थर चले

मय-कदे क़ानून के बिस्तर पे जा के सो चुके
रात आधी जा चुकी अब हम भी अपने घर चले