उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kitni saza mili hai mujhe arz-e-haal par

कितनी सज़ा मिली है मुझे अर्ज़-ए-हाल पर

کتنی سزا ملی ہے مجھے عرض حال پر

शायर: Jafar Baluch5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कितनी सज़ा मिली है मुझे अर्ज़-ए-हाल पर
पहरे लगे हुए हैं मिरी बोल-चाल पर

कहते हैं लोग जोशिश-ए-फ़स्ल-ए-बहार है
फूलों का जब मिज़ाज न हो ए'तिदाल पर

तू अपनी सिसकियों को दबा अपने अश्क पोंछ
ऐ दोस्त छोड़ दे तू मुझे मेरे हाल पर

फिर आज इस्मतों की जबीं है अरक़ अरक़
तोहमत लगी है फिर किसी मरियम-ख़िसाल पर

महसूस बारहा ये हुआ है कि ज़िंदगी
इक बर्फ़ की डली है कफ़-ए-बर्शगाल पर