उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHizan ke dosh pe hai fasl-e-gul ka raKHt abhi

ख़िज़ाँ के दोश पे है फ़स्ल-ए-गुल का रख़्त अभी

خزاں کے دوش پہ ہے فصل گل کا رخت ابھی

शायर: Jafar Baluch5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़िज़ाँ के दोश पे है फ़स्ल-ए-गुल का रख़्त अभी
कि बर्ग-ओ-बार से ख़ाली है हर दरख़्त अभी

अभी ग़मों से इबारत है सर-नविश्त-ए-बशर
कि आसमान परे है ज़मीन सख़्त अभी

समझ शुआ-ए-बुरीदा न सिर्फ़ जुगनू को
किरन किरन का जिगर होगा लख़्त लख़्त अभी

मता-ए-जाँ भी उसे पेश कर चुका हूँ मैं
मिरे रक़ीब का लहजा है क्यूँ करख़्त अभी

तमाम रात रहा मय-कदा-नशीं 'जाफ़र'
गया है उठ के यहाँ से वो नेक-बख़्त अभी