उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi gul mein nahin pane ki tu bu-e-wafa hargiz

किसी गुल में नहीं पाने की तू बू-ए-वफ़ा हरगिज़

کسی گل میں نہیں پانے کی تو بوئے وفا ہرگز

शायर: Taban Abdul Hai5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी गुल में नहीं पाने की तू बू-ए-वफ़ा हरगिज़
'अबस अपना दिल ऐ बुलबुल चमन में मत लगा हरगिज़

तबीबों से इलाज-ए-'इश्क़ होता है निपट मुश्किल
हमारे दर्द की उन से नहीं होने की दवा हरगिज़

तजा घर एक और सारे बयाबाँ का हुआ वारिस
कोई मजनूँ सा अय्यारा न होगा दूसरा हरगिज़

बहार आई है क्यूँकर अंदलीबें बाग़ में जावें
क़फ़स के दर के तईं करता नहीं सय्याद वा हरगिज़

न थे 'आशिक़ किसी बे-दाद पर हम जब तलक 'ताबाँ'
हमारे दिल के तईं कुछ दर्द-ओ-ग़म तब तक न था हरगिज़