उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aisa kahan hubab koi chashm-e-tar ki hum

ऐसा कहाँ हुबाब कोई चश्म-ए-तर कि हम

ایسا کہاں حباب کوئی چشم تر کہ ہم

शायर: Taban Abdul Hai9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ऐसा कहाँ हुबाब कोई चश्म-ए-तर कि हम
लब ख़ुश्क ये मुहीत है कब इस क़दर कि हम

ऐसा नहीं ग़रीब कोई घर-ब-घर कि हम
ऐसा नहीं ख़राब कोई दर-ब-दर कि हम

मूदाम ही मुशब्बक-ए-मिज़्गान-ए-यार है
लेकिन न इस क़दर रहे ख़स्ता-जिगर कि हम

गो आज हम हैं बे-सर-ओ-पा देखिए कि कल
ये राह-ए-पुल-सिरात करे शैख़ सर कि हम

हम बहसते हैं चाक-ए-गरेबाँ पे तेरे साथ
और देखिए कि हम से रहे तू सहर कि हम

रोते अदम से आए थे रोते ही जाएँगे
ऐसा नहीं अज़ल से कोई नौहागर कि हम

दुनिया कि नेक ओ बद से मुझे कुछ ख़बर नहीं
इतना नहीं जहाँ मैं कोई बे-ख़बर कि हम

पूछा मैं उस से कौन है क़ातिल मिरा बता
कहने लगा पकड़ के वो तेग़ ओ सिपर कि हम

दीवाँ हमारा ग़ौर से 'ताबाँ' तू देख तो
रखता है कब मुहीत ये गंज-ए-गुहर कि हम