उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dagh-e-dil apna jab dikhata hun

दाग़-ए-दिल अपना जब दिखाता हूँ

داغ دل اپنا جب دکھاتا ہوں

शायर: Taban Abdul Hai5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दाग़-ए-दिल अपना जब दिखाता हूँ
रश्क से शम्अ को जलाता हूँ

वो मिरा शोख़ है निपट चंचल
भाग जाता है जब बुलाता हूँ

उस परी-रू को देखता हूँ जब
हो के दीवाना सुध भुलाता हूँ

मुझ को देता है गालियाँ उठ कर
नींद से जब उसे जगाता हूँ

जब मुझे घेरता है ग़म 'ताबाँ'
साग़र-ए-मय को भर पिलाता हूँ