उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwab dar aae hain wahshat ki numu-yabi ko

ख़्वाब दर आए हैं वहशत की नुमू-याबी को

خواب در آئے ہیں وحشت کی نمو یابی کو

शायर: Osaama ameer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाब दर आए हैं वहशत की नुमू-याबी को
और मैं बेदार हुआ देखने सैराबी को

मुझ से पूछे कोई आईने में क्या होता है
मैं जुनूँ-ज़ाद कि बाहम रहा बेताबी को

मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़रती है तभी देखता हूँ
आतिश-ए-'इश्क़ लिए इस दिल-ए-सैलाबी को

बहस मौजूद-ओ-मयस्सर में न शामिल रखिए
इक ग़नीमत ही समझिए मिरी कम-याबी को

दर-हक़ीक़त तो ये आँखों का ज़ियाँ है मेरी
आप ने ख़्वाब समझ रक्खा है बे-ख़्वाबी को

आप की तब'-ए-ख़िज़ाँ हम पे बरसती है बहुत
हम ने मज़मून किया मौसम-ए-शादाबी को