उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHuda se bhi kab koi furqat kaTi hai

ख़ुदा से भी कब कोई फ़ुर्क़त कटी है

خدا سے بھی کب کوئی فرقت کٹی ہے

शायर: Naeem Sarmad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुदा से भी कब कोई फ़ुर्क़त कटी है
शब-ए-हिज्र शब से भी पहले बनी है

मैं इक ख़्वाब हूँ तेरा देखा हुआ हूँ
तू इक नींद है मुझ में सोई पड़ी है

हवस तो नहीं है मगर ये थी सच है
मुझे तुझ बदन की तमन्ना रही है

मुझे इस से आज़ाद कर दूसरी ला
ये ज़ंजीर पैरों में कम बोलती है

मैं अपने गुनाहों पे नादिम नहीं हूँ
ये तौबा तो तेरी मोहब्बत में की है